एक देश, अनेक शिक्षा प्रणालियाँ ! - सी एम जैन ,खोजी पत्रकार।
भारत को अक्सर "विविधताओं का देश" कहा जाता है। भाषाएँ अलग हैं, पहनावे अलग हैं, संस्कृतियाँ अलग हैं और जीवन-शैली भी अलग-अलग है। यही विविधता भारत की सबसे बड़ी शक्ति मानी जाती है। लेकिन एक प्रश्न ऐसा है, जिसे हमने शायद कभी गंभीरता से पूछने की कोशिश ही नहीं की—क्या शिक्षा भी विविधता का विषय होनी चाहिए, या समान अवसर का?

आज भारत का हर बच्चा चाहे राजस्थान में जन्मा हो, बिहार में, गुजरात में, तमिलनाडु में या असम में—वह अंततः उसी भारत का नागरिक है। आगे चलकर वही बच्चा UPSC देगा, वही JEE और NEET देगा, वही सेना में भर्ती होगा, वही न्यायपालिका, प्रशासन, विज्ञान, उद्योग और राजनीति में अपनी जगह बनाएगा। राष्ट्रीय प्रतियोगिताएँ सबके लिए समान हैं, लेकिन उन प्रतियोगिताओं तक पहुँचने का रास्ता सबके लिए समान नहीं है। यही भारतीय शिक्षा व्यवस्था का सबसे बड़ा विरोधाभास है।

संविधान का अनुच्छेद 14 सभी नागरिकों को कानून के समक्ष समानता का अधिकार देता है। अनुच्छेद 21A प्रत्येक बच्चे को शिक्षा का अधिकार देता है। नीति-निर्देशक तत्व राज्य से अपेक्षा करते हैं कि वह समान अवसर उपलब्ध कराए। लेकिन व्यवहार में भारत की शिक्षा व्यवस्था अनेक परतों में बँटी हुई दिखाई देती है। कहीं राज्य बोर्ड, कहीं CBSE, कहीं ICSE, कहीं अलग-अलग क्षेत्रीय पाठ्यक्रम।

क्या गणित, विज्ञान, संविधान, नागरिक शास्त्र, अर्थव्यवस्था, डिजिटल साक्षरता और बुनियादी जीवन-कौशल जैसे विषयों का न्यूनतम स्तर भी राज्य-राज्य में अलग होना चाहिए?

जब राष्ट्रीय प्रतियोगी परीक्षा में प्रश्नपत्र समान होता है, तब तैयारी की बुनियाद अलग क्यों है? यदि अंतिम दौड़ एक ही ट्रैक पर होनी है, तो शुरुआती रेखा अलग-अलग क्यों खींची गई है?राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने शिक्षा सुधार की दिशा में कई महत्वपूर्ण प्रस्ताव रखे। बुनियादी साक्षरता, कौशल विकास, बहुभाषिकता और लचीले पाठ्यक्रम जैसे विचार स्वागतयोग्य है ।

समस्या केवल पाठ्यक्रम की नहीं है। किताबें अलग, उनकी कीमतें अलग, निजी विद्यालयों की फीस अलग, यूनिफॉर्म की व्यवस्था अलग, डिजिटल संसाधनों की उपलब्धता अलग। कई स्थानों पर अभिभावकों को विद्यालय द्वारा निर्धारित विशेष दुकानों से ही किताबें और यूनिफॉर्म खरीदनी पड़ती हैं। शिक्षा धीरे-धीरे अधिकार से अधिक बाज़ार का विषय बनती दिखाई देती है।

One Nation, One Syllabus" नहीं, बल्कि One Nation, One Minimum Education Standard" हो सकता है।

इसका अर्थ यह नहीं कि तमिलनाडु राजस्थान का इतिहास पढ़ाए या राजस्थान के विद्यालय मलयालम पढ़ाएँ। इसका अर्थ यह है कि देश का प्रत्येक बच्चा, चाहे वह किसी भी बोर्ड में पढ़ता हो, कम-से-कम गणित, विज्ञान, संविधान, नागरिक शास्त्र, भारतीय इतिहास की मूल रूपरेखा, अर्थव्यवस्था, डिजिटल साक्षरता, पर्यावरण और जीवन-कौशल का एक समान राष्ट्रीय स्तर प्राप्त करे ।

इस चर्चा में फीस का प्रश्न भी उतना ही महत्वपूर्ण है। शिक्षा यदि अधिकार है, तो उसकी पहुँच भी समान होनी चाहिए। यह व्यावहारिक रूप से संभव नहीं कि देश के हर निजी विद्यालय की फीस एक जैसी हो, क्योंकि भूमि, वेतन और संचालन लागत अलग-अलग हैं। लेकिन यह अवश्य संभव है कि फीस निर्धारण के लिए पारदर्शी राष्ट्रीय मानक हों, मनमानी वृद्धि पर नियंत्रण हो ।

पूरे देश में एक जैसी पोशाक व्यावहारिक न हो, लेकिन कम-से-कम ऐसा ड्रेस कोड विकसित किया जा सकता है जो अनावश्यक आर्थिक बोझ कम करे। यूनिफॉर्म किसी एक विक्रेता से खरीदने की बाध्यता समाप्त हो और अभिभावकों को खुले बाज़ार से निर्धारित मानक के अनुसार वस्त्र खरीदने की स्वतंत्रता मिले।

आज भारत "विश्वगुरु" बनने की आकांक्षा रखता है। लेकिन कोई भी राष्ट्र अपनी शिक्षा व्यवस्था से ऊपर नहीं उठ सकता। विश्व की अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं ने पहले अपनी शिक्षा व्यवस्था को मजबूत किया, उसके बाद विज्ञान, उद्योग और नवाचार में नेतृत्व प्राप्त किया।

यह लेख किसी राज्य के विरुद्ध नहीं है, किसी बोर्ड के विरुद्ध नहीं है और न ही किसी सरकार के विरुद्ध। यह केवल एक प्रश्न उठाता है—क्या भारत के बच्चों को कम-से-कम समान बुनियादी शिक्षा का अधिकार मिलना चाहिए?

यदि उत्तर "हाँ" है, तो अब बहस केवल शिक्षा नीति पर नहीं, बल्कि शिक्षा समानता पर होनी चाहिए। शायद समय आ गया है कि देश National Minimum Education Standard" पर गंभीर राष्ट्रीय विमर्श शुरू करे—ऐसा मानक जो राज्यों की विविधता का सम्मान करे, लेकिन बच्चों के भविष्य में असमानता न पैदा करे।