आंदोलन कौन कर रहा है—जनता, विपक्ष या राजनीति? -सी एम जैन
• सुरेश कुमार सिंह गौतम
*दिल्ली के जंतर-मंतर से झारखंड की सड़कों तक बदलते किरदारों के बीच सबसे बड़ा सवाल—आंदोलनकारी की आवाज़ कहाँ है?*
राजनीति की सबसे सुविधाजनक बात यही है कि *आंदोलन का श्रेय कोई नहीं लेता, लेकिन उसका राजनीतिक लाभ लेने में कोई पीछे नहीं रहता।* सत्ता में बैठे लोग कहते हैं—आंदोलन विपक्ष की साजिश है। विपक्ष कहता है—यह जनता की आवाज़ है। सत्ता बदलती है तो बयान बदल जाते हैं, चेहरे बदल जाते हैं और कई बार उसी आंदोलन को देखने का पूरा चश्मा ही बदल जाता है। लेकिन इस पूरी राजनीति के बीच सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति अक्सर वही रह जाता है जिसकी आवाज़ से आंदोलन शुरू हुआ था—आंदोलनकारी। सवाल इसलिए केवल यह नहीं है कि दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्र क्यों उतरे, झारखंड में छात्र क्यों सड़क पर आए या किस राजनीतिक दल ने किस आंदोलन का समर्थन किया। असली सवाल इससे कहीं बड़ा है—*आंदोलन जनता की आवाज़ हैं या राजनीति के लिए उपलब्ध सबसे प्रभावशाली हथियार?*
इस सवाल का उत्तर खोजने से पहले एक बात स्वीकार करनी होगी कि किसी आंदोलन में शामिल छात्रों की समस्या को केवल इसलिए झूठा नहीं कहा जा सकता क्योंकि बाद में कोई राजनीतिक दल उनके साथ खड़ा दिखाई देता है। छात्र की समस्या वास्तविक हो सकती है, उसकी पीड़ा वास्तविक हो सकती है और उसकी मांग भी पूरी तरह जायज हो सकती है। लेकिन समस्या के वास्तविक होने का अर्थ यह नहीं कि उसके आसपास की राजनीति भी अनुपस्थित है।
दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्रों का आंदोलन इसी जटिलता को सामने लाता है। आंदोलन में छात्र नेता नेहा बोरा और उनके साथियों की सक्रियता से लेकर बाद में आंदोलन के राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आने तक एक ऐसा घटनाक्रम बना जिसमें छात्र मुद्दा धीरे-धीरे राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन गया। Sonam Wangchuk का जंतर-मंतर पहुँचना । बाद में आंदोलन में राजनीतिक नेताओं की मौजूदगी और समर्थन भी दिखाई दिया। Rahul Gandhi ने धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद इसे छात्रों की जीत बताया और कहा कि शिक्षा व्यवस्था देश की पहचान रही है।
यहीं से राजनीति का दूसरा चेहरा दिखाई देता है। जब आंदोलन भाजपा सरकार के सामने खड़ा था, तब विपक्ष उसके साथ दिखाई दिया। भाजपा की ओर से आंदोलन के पीछे राजनीतिक भूमिका होने के आरोप लगाए गए। विपक्ष ने ऐसे आरोपों को स्वीकार नहीं किया। यही तर्क दूसरी दिशा में भी लागू होता है। यदि दिल्ली में विपक्ष के किसी राजनीतिक हस्तक्षेप की संभावना को केवल इसलिए खारिज नहीं किया जा सकता कि विपक्ष ने उसे स्वीकार नहीं किया, तो झारखंड में भाजपा की भूमिका की संभावना को भी केवल सरकार के आरोप के आधार पर सच नहीं मान लिया जा सकता। *आरोप दोनों तरफ हैं; प्रमाण ही वह चीज है जो आरोप और सत्य के बीच अंतर करती है।*
फिर झारखंड सामने आया और कहानी का राजनीतिक कोण लगभग उलट गया। यहाँ हेमंत सोरेन की सरकार है, कांग्रेस उसके साथ है और भाजपा विपक्ष में है। झारखंड में JPSC और JSSC परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं तथा पेपर लीक के आरोपों को लेकर छात्र आंदोलन कर रहे हैं।
दिल्ली में समीकरण था—*भाजपा सत्ता में, विपक्ष आंदोलन के साथ।* झारखंड में समीकरण है—*हेमंत सोरेन की सरकार सत्ता में, भाजपा आंदोलन के साथ।* किरदार बदल गए, राजनीतिक बयान बदल गए और आंदोलन को देखने की भाषा भी बदल गई। तब सवाल उठना स्वाभाविक है—*आंदोलन के सिद्धांत सत्ता बदलते ही कैसे बदल जाते हैं?*
यदि दिल्ली में आंदोलनकारी पर कार्रवाई लोकतंत्र पर हमला थी, तो झारखंड में वैसी ही कार्रवाई कानून-व्यवस्था कैसे बन सकती है? यदि झारखंड में छात्र अपनी मांग के लिए सड़क पर उतरकर लोकतांत्रिक अधिकार का इस्तेमाल कर रहे हैं, तो दिल्ली में छात्रों की मांग को राजनीतिक साजिश कहने की जरूरत क्यों पडी ।
*आंदोलन जनता का हो सकता है, दर्द जनता का हो सकता है, मांग जनता की हो सकती है; लेकिन आंदोलन की दिशा और उसकी राजनीतिक कीमत हमेशा जनता तय करे, यह जरूरी नहीं।*
दिल्ली से झारखंड तक की कहानी 2029 की राजनीति से जुड़ जाती है। 2029 में लोकसभा चुनाव होने हैं। यदि विपक्ष यह मानता है कि 2026 से 2029 तक छात्रों, शिक्षा और दूसरे जनमुद्दों से जुड़े आंदोलनों को लगातार राजनीतिक ऊर्जा देकर भाजपा के खिलाफ एक ऐसा वातावरण तैयार किया जा सकता है जो चुनाव तक सत्ता-विरोधी लहर में बदल जाए, तो यह रणनीति उलटी भी पड़ सकती है। क्योंकि *आंदोलन को जिंदा रखना और समस्या को जिंदा रखना एक बात नहीं है।
भारत को केवल शिक्षा के मुद्दे पर वर्षों तक एक सूत्र में बाँधना आसान नहीं है। देश में बेरोजगारी है, महंगाई है, किसान हैं, स्वास्थ्य है, रोजगार है, स्थानीय भ्रष्टाचार है, विस्थापन है और हर वर्ग, हर उम्र तथा हर क्षेत्र की अपनी प्राथमिकताएँ हैं। छात्र समाज का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, लेकिन पूरा समाज नहीं।
*आंदोलन लोकतंत्र की बीमारी नहीं, लोकतंत्र का अलार्म है।* जब संस्थाएँ सुनती हैं तो सड़क पर उतरने की जरूरत कम होती है।। जब जनता सड़क पर उतरती है तो राजनीतिक दल उसके साथ इसलिए खड़े होते हैं क्योंकि उन्हें जनता की समस्या दिखाई देती है, या इसलिए क्योंकि उन्हें सत्ता में बैठे अपने प्रतिद्वंद्वी की कमजोरी दिखाई देती है?
*सत्ता में रहते हुए आंदोलन समस्या दिखाई देता है, विपक्ष में रहते हुए वही आंदोलन लोकतंत्र की आवाज़ बन जाता है।*
आंदोलन का मालिक कोई नहीं बनता, लेकिन उसके राजनीतिक लाभ का उत्तराधिकारी बनने के लिए हर कोई तैयार रहता है। सत्ता कहती है—यह विपक्ष की साजिश है। विपक्ष कहता है—यह जनता की आवाज़ है।
इसलिए लोकतंत्र के सामने अंतिम सवाल यह नहीं कि आंदोलन किसने शुरू किया। *असली सवाल यह है कि आंदोलन खत्म होने के बाद उसकी मांग किसने पूरी की।* क्योंकि आंदोलन की सबसे बड़ी जीत सरकार का झुकना नहीं है। उसकी सबसे बड़ी जीत तब होगी, जब अगली पीढ़ी को उसी मांग के लिए फिर सड़क पर न उतरना पड़े।