माघ मकर गत रवि जब होई,तीरथ पतिहिं आव सब कोई ।
देव दनुज किन्नर नर श्रेनी, सादर मज्जहिं सकल त्रिवेनी ।।
―रामचरित मानस
प्रयाग जो तीन नदियों की संगम स्थली है, वहाँ आज दो नदियों का संगम दिखाई देता है ।गंगा की उज्ज्वल धारा ,यमुना के नील जल प्रवाह के साथ मिलकर एक विलक्षण सौंदर्यबोध पैदा करती है।दोनों का स्वरूप और आवेग साफ -साफ पहचाना जा सकता है।सरस्वती की धारा यधपि अब विलुप्त हो चुकी है पर विलुप्त होकर भी वे वाग्देवी के रूप में प्रतिष्ठित हैं।
मेले का इतिहास
कुम्भ मेले का इतिहास सिन्धु घाटी की संस्कृति से भी पुराना है।कुछ विद्वानों के अनुसार यह मेला 3465 ई.पू. आरम्भ हुआ था ।यानि हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की संस्कृति के 1000 साल पहले। 2382 ई.पू.महर्षि विश्वामित्र ने माघ पूर्णिमा पर पवित्र स्नान करने के महत्व को बताया था। 1302 ई. पू. महर्षि ज्योतिष ने माघ पूर्णिमा पर पवित्र स्नान करने के महत्व को बताया था। चीनी यात्री ह्वेन सांग जिसने सम्राट हर्षवर्धन के राज्यकाल 629 ई. पू. में यात्रा किया था उसने भी अपनी पुस्तक में कुम्भ मेले का वर्णन किया है ।
एक बड़ा मेला जो प्रति वर्ष त्रिवेणी ,प्रयागराज में होता है माघ मेला कहलाता है । यह तीन दिवसीय पर्व 13,14,15 जनवरी को मनाया जाता है। स्नान परम्परा का एक महत्वपूर्ण पर्व बसन्त पंचमी भी है ।
ब्रिटिश काल में कुम्भ
ऐसे प्रमाण मिलते हैं कि 1801 ई. में यह शहर अंग्रेजों के हाथ में आ गया था । अंग्रेजो ने 1810 ई के रेग्युलेशन के अंतर्गत एक तीर्थयात्रा कर लगाया ,जिसे बाद में हटा दिया गया। 1815 ई. के गजेटियर में वर्णित है कि माघ मेले की समिति का नाम प्रागवाल (प्रयागवाल) था । 1815-ईस्ट इंडिया गजेटियर के अनुसार माघ मेले में 1812-1813 में आने वाले यात्रियों की संख्या 2,18,792 हो गई ।
प्रयाग में मेला माघ के महीने में शताब्दियों से हो रहा है परन्तु *कुम्भ मेला* शब्द का प्रयोग 1870 ई.में पहली बार अभिलेखों में दर्ज हुआ ।
कुम्भ 1930-मॉर्डन रिव्यू(1930)
इस रिव्यू के अनुसार मेले में 1 मिलियन लोग थे जो किले के पश्चिम में एकत्र हुए ।इस दौरान न तो कोई महामारी फैली और न ही कोई दुर्घटना हुई ।5000 साधू भी थे जिनके पास औजार और धार्मिक शस्त्र थे ,वे शांति से रहे ।
कुम्भ
महाकाव्य और पौराणिक कथाओं की मान्यताओं के अनुसार समुद्र मंथन के पश्चात निकले अमृत कलश को लेकर भाग-दौड़ में 12 स्थानों पर अमृत की बूंदें छलकने का वृत्तान्त मिलता है ,जिनमे चार स्थान इस मृत्यु लोक में, चार स्थान आकाश लोक में, शेष चार स्थान पाताल लोक में हैं। पृथ्वी इन चारों स्थानों पर कुम्भ पर्व मनाया जाता है।
गंगा नदी के तट पर हरिद्वार, त्रिवेणी(गंगा यमुना सरस्वती) तट पर प्रयाग,क्षिप्रा नदी के तट पर उज्जैन, गोदावरी नदी के तट पर नासिक शामिल हैं
कुम्भ का हर मेला एक-दूसरे से तीन वर्ष के अंतर पर बारी-बारी से चार स्थानों पर होता है ।प्रत्येक स्थान पर 12 वर्ष बाद कुम्भ मेले की बारी आती है ।
प्रयाग कुम्भ 2019 के विश्व कीर्तमान
2019 कुम्भ प्रयागराज *गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड* में अंकित हुआ ।पहला रिकार्ड परिवहन विभाग द्वारा 28 फरवरी 2019 को बनाया गया,जिसमें सोरांव-नवाबगंज राजमार्ग पर 503 शटल बसों की परेड,दूसरा 1 मार्च 2019 को गंगा पण्डाल में लगातार8 घण्टे तक 7000 से अधिक लोंगो द्वारा हाथ का छाप लगाना ,तीसरा रिकार्ड 2 मार्च 2019 को पहली बार दस हजार सफाईकर्मियों द्वारा झाड़ू लगाकर स्वच्छता का संदेश देना शामिल था