महर्षि सुश्रुत की शल्य चिकित्सा पद्धति आज भी चिकित्सा विज्ञान के लिए प्रेरणास्रोत : प्रो. डॉ. नवीन सिंह
• सुरेश कुमार सिंह गौतम
बस्ती(उ0प्र0)-15 जुलाई 2026, विश्व संवाद परिषद योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा प्रकोष्ठ, भारत के राष्ट्रीय महासचिव प्रो. डॉ. नवीन सिंह ने कहा कि महर्षि सुश्रुत भारतीय चिकित्सा विज्ञान के ऐसे महान ऋषि थे, जिन्होंने हजारों वर्ष पूर्व शल्य चिकित्सा (सर्जरी) को वैज्ञानिक आधार प्रदान किया। उन्हें विश्व का प्रथम शल्य चिकित्सक तथा "फादर ऑफ सर्जरी" के रूप में सम्मान प्राप्त है। उनकी चिकित्सा पद्धति, अनुसंधान और वैज्ञानिक दृष्टिकोण आज भी आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के लिए प्रेरणास्रोत बने हुए हैं।
प्रो. डॉ. नवीन सिंह ने बताया कि महर्षि सुश्रुत का संबंध प्राचीन काशी से माना जाता है। उन्होंने भगवान धन्वंतरि से आयुर्वेद एवं शल्य चिकित्सा की शिक्षा प्राप्त कर चिकित्सा जगत को अमूल्य योगदान दिया। उनकी रचित 'सुश्रुत संहिता' आयुर्वेद का एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है, जिसमें शल्य चिकित्सा, शरीर रचना विज्ञान, नेत्र रोग, अस्थि रोग, विष चिकित्सा तथा अनेक रोगों के उपचार का विस्तृत एवं वैज्ञानिक वर्णन मिलता है।
उन्होंने कहा कि सुश्रुत संहिता में लगभग 300 प्रकार की शल्य क्रियाओं तथा 120 से अधिक शल्य उपकरणों का उल्लेख मिलता है। नाक के पुनर्निर्माण (राइनोप्लास्टी), मोतियाबिंद के ऑपरेशन, हड्डियों के उपचार और घावों की चिकित्सा जैसी उन्नत तकनीकों का वर्णन इस ग्रंथ में मिलता है, जो उस समय की चिकित्सा व्यवस्था की वैज्ञानिकता को प्रमाणित करता है।
प्रो. डॉ. नवीन सिंह ने कहा कि महर्षि सुश्रुत ने चिकित्सा शिक्षा में व्यावहारिक प्रशिक्षण को विशेष महत्व दिया। उनका मानना था कि बिना अभ्यास के कोई भी चिकित्सक दक्ष नहीं बन सकता। इसलिए वे विद्यार्थियों को फल, सब्जियों, मोम तथा मृत शरीर पर शल्य अभ्यास कराते थे, जिससे उनकी दक्षता विकसित हो सके। यह पद्धति आज भी आधुनिक चिकित्सा शिक्षा के मूल सिद्धांतों में शामिल है।
उन्होंने कहा कि महर्षि सुश्रुत ने चिकित्सकों के लिए नैतिकता, अनुशासन, स्वच्छता, करुणा और रोगी की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। उनका संदेश था कि चिकित्सक केवल रोग का उपचार ही नहीं, बल्कि मानव सेवा का भी माध्यम है।
प्रो. डॉ. नवीन सिंह ने कहा कि वर्तमान समय में जब आधुनिक चिकित्सा निरंतर विकसित हो रही है, तब महर्षि सुश्रुत के सिद्धांतों और आयुर्वेद की वैज्ञानिक परंपरा को समझना और आगे बढ़ाना अत्यंत आवश्यक है। भारतीय चिकित्सा की यह महान विरासत आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी रहेगी।